मंगलवार, 11 सितंबर 2012

देश के संपादकों के नाम पत्र





मुम्बई
18.07.2012

विषयः दवाइयों में मुनाफाखोरी के सम्बन्ध में
मान्यवर,
देश के विचारवान लोगों के बीच में सबसे ऊपर बैठे आप महानुभावों से अनुरोध करता हूं कि आपलोग दवाइयों की मार से त्रस्त जनता की आवाज को अपने पत्र-पत्रिका, टीवी चैनल्स में स्थान देकर सरकार की अव्यवस्थित व्यवस्था को व्यवस्थित करने के लिए सरकार पर दबाव बनाएं।
ज्ञात है कि देश को स्वस्थ रखने में दवाइयों का कितना अहम् योगदान हैं। जितना महत्वपूर्ण रोटी, कपड़ा और मकान है, उतनी ही जरूरी दवाइयां भी हैं। हिन्दुस्तान का शायद ही कोई परिवार ऐसा होगा जिसे डॉक्टर और दवाइयों की जरूरत न पड़ती हो। ऐसे में दवाइयों के नाम पर जिस तरीके से लूट मची है, उसको रोकने के लिए सरकार के पास जनता की आवाज पहुंचाना आप सभी की जिम्मेदारी है।
देश का एक सजग नागरिक होने के नाते आप सब से अनुरोध करता हूं कि इस दिशा में आपलोग अपनी ‘विज्ञापन नीति’ को नजरअंदाज कर, देशहित में जनता की आकंक्षाओं को पूर्ण करने में अपनी भूमिका सुनिश्चित करें।
एक हिन्दुस्तानी
आशुतोष कुमार सिंह
मुम्बई, 
संपर्कःpratibhajanai@gmail.com
08108110151

सरकारी प्राइस कंट्रोल की धज्जियां उड़ा रही हैं दवा कंपनियां


कंट्रोल एम.एम.आर.पी अभियान के तहत...

आशुतोष कुमार सिंह
सरकार द्वारा सस्ती दवाइयां बेचने के दावों को ठेंगा दिखाते हुए दवा कंपनियां मनमाने तरीके से दवाइयों की एम.आर.पी तय कर रही हैं. राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एन.पी.पी.ए) द्वारा दवाइयों की कंट्रोल मूल्य से ज्यादा पर धड़ल्ले से बेची जा रही हैं.
एन.पी.पी.ए द्वारा 31 मार्च 2011 को जारी जारी ‘कंपेडियम ऑफ द प्राइस ऑफ सिड्यूल्ड ड्रग’ के सातवें एडिसन के अनुसार सिप्रोफ्लाक्सासिन-500 मि.ग्रा के चार टैबलेट की स्ट्रीप को सिपला, रैनबैक्सी और जाइडस कैडिला जैसी कंपनियां गैजेट संख्या 438(ई)) के अनुसार नोटिफिकेशन संख्या (10.061997) के तहत 24.2 रूपये में बेच सकती हैं.
वही दूसरी ओर एफ.डी.सी, अलकेम और माइक्रो इसी नोटिफिकेशन के तहत प्रति चार टैबलेट 23.92 रुपये में बेच सकती हैं. इसके उलट मुम्बई की एक रिटेल दुकान पर जब इन कंपनियों की दवाइयों का रेट मालुम करने पर पता चला कि रैनबैक्सी सिफरान-500 मि.ग्रा. नामक ब्रांड से 99.50 रूपये प्रति 10 टैबलेट बेच रही है तो सिपला सिपलॉक्स 500 के नाम से 93.36 रूपये प्रति 10 टैबलेट बेच रही है. आश्चर्यजनक तरीके से इसी सॉल्ट को लेकर एफडीसी जाक्सन-500 मि.ग्रा. नामक ब्रांड को 55 रूपये में बेच रही है.
गौरतलब है कि देश में दवाइयों के मूल्य को निर्धारित करने की जिम्मेदारी  एन.पी.पी.ए की है. इस संबंध में एन.पी.पी.ए के चेयरमैन सी.पी सिंह का कहना है कि अगर किसी भी ग्राहक को यह लगता है कि उससे दुकानदार एन.पी.पी.ए द्वारा निर्धारित मूल्य से ज्यादा पैसा वसूल रहा है तो वह हमें शिकायत कर सकता है. इसके लिए हमारी वेवसाइट (http://nppaindia.nic.in/) पर फार्म उपल्बध है.
दवाइयों में मुनाफाखोरी खत्म करने के लिए ‘कंट्रोल एम.एम.आर.पी’ अभियान चलाने वाली संस्था प्रतिभा जननी सेवा संस्थान का कहना है कि भारत एक लोककल्याणकारी राज्य है. अतः सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह आम जनता को सस्ती दवाइयां उपल्बध कराए.
(लेखक प्रतिभा जननी सेवा संस्थान के नेशनल को-आर्डिनेटर व युवा पत्रकार हैं.)



ब्रांड चाहिए की दवाइयाँ!!!

कंट्रोल एम.एम.आर.पी अभियाने के तहत...

• ‘ब्रांड’ के नाम पर मरीजों को लूट रही हैं दवा कंपनियां!!!• एक ही सॉल्ट की दवा को एथिकल के नाम पर कोई 50 रूपये में तो कोई 100 रूपये में बेच रहा है!!! 

आशुतोष कुमार सिंह
भारत एक लोककल्याणकारी राज्य है। इस देश में गरीबों को जिस तरीके से लूटा जा रहा है, उसे देखकर दुःखद आश्चर्य होता है। जिसको जहां लूटने का मौका मिल रहा है,वह वहां लूटने में जुटा है। इस बार मैं दवा कंपनियों की लूट की बात करने जा रहा हूं।
दवा कारोबार से जुड़े लोग जानते हैं कि इस कारोबार में दो तरीके से दवाइयाँ बेची जाती है। एक जेनरिक के नाम पर दूसरी एथिकल के नाम पर। जेनरिक और एथिकल को लेकर आम लोगों में यह भ्रम है कि एथिकल दवाइयां असली होती हैं और जेनरिक नकली। जबकि वास्तविकता यह है कि जेनरिक और एथिकल केवल बाजार की बनाई हुई दवा बेचने की तरकीबे हैं। जहाँ जेनरिक दवाइयां डायरेक्ट मार्केट में आती हैं और एथिकल दवाइयों को बेचने के लिए एक सांगठनिक ढांचा विकसित किया जाता है। परिणाम स्वरूप एथिकल दवाइयां मरीजों तक पहुंचते-पहुंचते अपनी लागत मूल्य से अप टू 1500 प्रतिशत मंहगी बिकती हैं। और वही जेनरिक दवाइयाँ डायरेक्ट मार्केट में आती हैं, उनको लेकर कोई खास मार्केटिंक नहीं होती है। ऐसे में जेनरिक एथिकल दवाइयों की अपेक्षाकृत कम मूल्य पर बेची जाती हैं।
खैर, इन बातों पर चर्चा करने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि यह जाना जाए की एथिकल दवा के नाम पर कंपनियाँ मरीजों को कैसे लूट रही हैं।
कुछ एंटीबायोटिक दवाइयों के उदाहरण के साथ अपनी बात शुरू करूंगा। बुखार से लेकर कटे, जले में आम तौर पर जिस सॉल्ट का इस्तेमाल अंग्रेजी दवाइयों में किया जाता हैं वे हैं- अमौक्सीसिलिन, सिप्रोफ्लाक्सासिन, एजिथ्रोमाइसिन, ओ-फ्लॉक्सासिन, अमौक्सीसिलिन+कलॉक्सासाइकिलिन। इन सॉल्स्ी को लेकर देश की बड़ी-बड़ी कंपनियाँ अपनी ब्रांड नेम के साथ दवा बनाती हैं। जैसे सिप्रोफ्लाक्सासिन सॉल्ट लेकर एफडीसी जाक्सन(ZOXAN) ,सिपला सिपलॉक्स(CIPLOX) और रैनबैक्सी-सिफरान (CIFRAN) नामक दवा बनाती हैं। सबसे चौकाने वाली बात यह हैं कि एक ही सॉल्ट से बनाई गई दवाओं की एम.आर.पी. तुलनात्मक रूप से जमीन-आसमान का फर्क लिए हुए हैं। सिफरान-500 मि.ग्रा. का एम.आर.पी.-99.50 रूपये प्रति 10 टैबलेट है, वहीं सिपलॉक्स का एम.आर.पी.-93.36 रूपये प्रति10 टैबलेट हैं। आश्चर्यजनक तरीके से इसी सॉल्ट को लेकर एफडीसी जाक्सन-500 मि.ग्रा. 55 रूपये में बेचती है। यहाँ पर यह ध्यान देने वाली बात है कि सेम सॉल्ट की दवा एक तरफ एक कंपनी 55 रूपये में बेच रही है, वही दूसरी तरफ दूसरी दवा कंपनी 99.50 रूपये में बेचती है यानी 44.50 रूपये ज्यादा मूल्य के साथ। एक दूसरी एंटीबायोटिक है ओफ्लाक्सासिन। इस सॉल्ट को लेकर सिपला कंपनी ओ-फ्लॉक्स नामक दवा बनाती है और एफडीसी जो (ZO) नामक दवा बनाती है, वही रैनबैक्सी-जैनोसिन नामक दवा बनाती है। जरा इनकी एम.आर.पी पर ध्यान दीजिये-जैनोसिन 400 मि.ग्रा.प्रति प्राँच टैबलेट-102 रूपये यानी 10 टैबलेट का मूल्य 204 रूपये, ओफ्लॉक्स-400 मि.ग्रा. का एम.आर.पी है-144 रूपये प्रति 10 टैबलेट। वही एफ.डी.सी इसी दवा को जो- 400 मि.ग्रा. के रूप में 70 रूपये में बेच रही है। वही ओफ्लाक्सासिन 200 मि.ग्रा.प्रति 10 टैबलेट सिपला 88 रूपये में बेच रही है तो एफडीसी प्रति 10 टैबलेट 39.75 रूपये में बेच रही है।
इसी तरह अमौक्सीसिलिन और क्लाक्सासाइकिलिन के कंबीनेशन से बनी दवा एफ.डी.सी फ्लेमीक्लॉक्स एल-बी.के नाम पर 60.25 रूपये में बेच रही तो वही इसी साल्ट के साथ सिपला नोभाक्लॉक्स प्रति 9 कैप्सुल 53.50 रूपये में बेच रही है। जबकि इसी बाजार में अलकेम इसी दवा को नोडीमॉक्स प्लस नाम से प्रति 10 कैप्सुल-23 रूपये में बेच रही है। इसी तरह एजिथ्रोमाइसिन साल्ट से निर्मित दवा जैथ्रिन-500 मि.ग्रा को एफडीसी 66 रूपये प्रति 3 टैबलेट बेचती है तो सिपला एजेडइइ नाम से 71 रूपये में, अजीबैक्ट नाम से इपका 70 रूपये में, अजिथ्राल 92.50 रूपये में तो मोलेकुले इंडिया प्रा. लि. 65 रूपये में बेच रही है।
ऐसे में यह अहम सवाल है कि हमारे देश में एथिकल और ब्रांड के नाम पर जिस तरह से दवा कंपनियाँ आम मरीजों को लूट रही है, इसकी भनक हमारी सरकार को है भी की नहीं। अगर नहीं है तो शर्म की बात है और अगर जानकारी होते हुए इन्हें लुटने की आजादी दी जा रही है तो यह और भी शर्म की बात है। 
(लेखक प्रतिभा जननी सेवा संस्थान के नेशनल को-आर्डीनेटर व युवा पत्रकार हैं)

देश में कितनी दवाइयां , सरकार बेखबर!


कंट्रोल एम.एम.आर.पी अभियान के तहत



·      फौलिक एसिड, जेंटामाइसिन सहित कई महत्वपूर्ण दवाइयों का उत्पादन डाटा सरकार के पास नहीं·      दवा कंपनियों को मिलती मनमानी की खुली छूट·      राष्ट्रीय औषध मूल्य नियंत्रण प्राधिकरण लाचार


अमित कर्ण

देश में दवाइयों के उत्पादन पर सरकार बेखबर है. उसे नहीं मालूम की कम्पनियां  कौन- सी दवाई कितनी मात्रा में बना रहीं है. हैरत की बात यह है की साधारण से लेकर गंभीर बीमारियों के इलाज में काम आने वाली कुछ दवाईयों के उत्पादन का डाटा सरकार के पास पिछले तीन बरसों से नहीं है. राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण की वेबसाइट पर विटामिन, सेडेटिव्स, सल्फा ड्रग्स , एंटीपायरेटिक समेत ज्यादातर श्रेणियों की दवाइयों की कुछ दवाओं का उत्पादन डाटा नहीं है.
                 

दवाइयों में मुनाफोखोरी के खिलाफ कंट्रोल एम.एम.आर.पी. अभियान चला रही गैर सरकारी संस्था प्रतिभा जननी सेवा संस्थान के राष्ट्रीय समन्वयक आशुतोष कुमार सिंह के मुताबिक, " स्थिति दयनीय है. फौलिक एसिड, जेंटामायसिन,  विटामिन बी सीरिज की बी 1, बी 12, बी 2, 6, डी 3 का डाटा उपलब्ध नहीं है. गौरतलब है कि फॉलिक एसिड प्रेग्नेंट या गर्भवती महिलाओं को दी जाती है. गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को दी जाने वाली यह सबसे महत्वपूर्ण दवा है. इससे, ज़च्चा - बच्चा का पोषण होता है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है की आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर कदम बढ़ाने का दंभ भरने वाला भारत अपनी जननी की ही सुरक्षा करने में नाकाम साबित हो रहा है। देश में गरीबी, कुपोषण और कुप्रबंधन के कारण मां बनने के दौरान हर दस मिनट में एक महिला काल का ग्रास बन रही हैं। संयुक्त राष्ट्र की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में वर्ष 2010 में मां बनने के दौरान 57 हजार महिलाओं की मृत्यु हुई। इस दौरान भारत की मातृत्व मृत्यु दर पूरी दुनिया में हुई माताओं की मौतों का करीब 20 फीसदी रही। मौजूदा समय में भारत में प्रति एक लाख जन्म पर मातृत्व मृत्यु दर (एमएमआर) 212 है। जबकि भारत को सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य (एमडीजी) के तहत वर्ष 2015 तक इन आंकड़ों को घटाकर 109 तक लाना है। फौलिक एसिड ऐसी दवा है, जो सस्ती और सुलभ है. उत्पादन डाटा न होने के चलते इनकी मांग और आपूर्ति का पता नहीं चल पता और कंपनियां इनकी कीमतों पर मनमानी करती हैं.  यही हाल जेंटामायसिन,  विटामिन बी सीरिज की दवाइयों का है. इस मामले में जब राष्ट्रीय औषध मूल्य नियंत्रण प्राधिकरण के चेयरमैन सी.पी.सिंह से बात करने की कोशिश की तो स्पष्ट जवाब नहीं मिला। "
     

नोटः डाटा का डिटेल

http://nppaindia.nic.in/art/top9xxx.jpg
Data on Production of Selected Bulk Drugs of Selected Companies in the Orgainsed Sector During 2005-2006, 2006-07 and 2007-08.
S.No.
Name of the Therapeutic Group and Bulk Drugs
Unit
Actual Production



2005-06
2006-07
2007-08*
1
2
3
4
5
6
I
ANAESTHETICS

1
Lignocaine/Xylocaine
MT
78.291
78.453
69.590
2
Procaine
MT
N.A.
N.A.
N.A.
II
ANALGESICS & ANTIPYRETIC E

3
Analgin/Metamizole(s)
MT
231.412
353.357
240.882
4
Aspirin(s)
MT
1213.693
1072.271
921.378
5
Ibuprofen(s)
MT
5406.59
1083.511
5986.000
6
Oxyphenylbutazone
MT
N.A.
N.A.
N.A.
7
Paracetamol(reserved for small scale industries)
MT
N.A.
5185.428
N.A.
8
Pethidine
MT
0.197
0.232
N.A.
9
Phenyl Butazone(s)
MT
N.A.
N.A.
N.A.
10
Prioxicam
MT
0.420
N.A.
N.A.






लिंक


(लेखक दैनिक जागरण, मुंबई के वरिष्ठ संवाददाता हैं व प्रतिभा जननी सेवा संस्थान के मीडिया प्रभारी हैं)

अखिलेश जी आप सुन रहे हैं…




आशुतोष कुमार सिंह
उत्तरप्रदेश सरकार 22 ब्रांडेड दवाइयों को सरकारी अस्पताल के लिए खरीदने वाली है. जिन दवाइयों के नाम गिनाएं गए हैं, लगभग सभी साल्ट जेनरिक फार्म में उपलब्ध हैं. फिर ब्रांडेड दवाइयां खरीदने की हड़बड़ी क्यों है. समझ से परे है.
सबसे अहम मसला है कंट्रोल एम.एम.आर.पीयानी कंट्रोल मैक्सिमम रिटेल प्राइस का. ज़रूरत है इस मसले पर काम करने की. उल्टे में हमारी सरकारें भी दवा कंपनियों के दलालों के चक्कर में फंसती जा रही हैं. अगर दवाई की ख़रीद में सरकार ठीक से मोल-भाव नहीं कर पायी तो निश्चित है जनता का पैसा पानी में जायेगा. यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि जेनरिक और ब्रांडेड दवाइयों के उत्पादन में जो लागत आती है वह लगभग समान ही होती है. असल मूल्य तो बाजार में आकर बढ़ जाता है. अगर सरकार अपने द्वारा तय किए गए मूल्य पर दवाई खरीदती है तब तो ठीक है, नहीं तो जनता के पैसों की बर्बादी तय है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश जी हमारी बात को सुन रहे हों तो ज़रा ध्यान दें

गौरतलब है कि दवाओं में धांधली के मामले पूरे देश से एक-एक करके सामने आने लगे हैं. झारखंड से ख़बर है कि झारखंड के लगभग सभी दवा दुकानों में विभिन्न बीमारियों की सस्ती जेनरिक दवाएं उपलब्ध हैं, लेकिन डाक्टर भारी कमीशन के लालच में मरीज़ के पुर्जों पर महंगी ब्रान्डेड दवाएं ही लिखते हैं. जानकारों का कहना है कि जेनरिक दवा लिखने पर डाक्टर को कमीशन नहीं मिलता है. झारखंड से यह भी खबर आ रही है कि झारखंड के सरकारी अस्पतालों में मरीजों को सस्ती जेनरिक दवाएं उपलब्ध कराने में सिविल सर्जन रुचि नहीं दिखा रहे. राज्य के सभी सदर अस्पतालों व मेडिकल कालेजों में जेनरिक दवा की बिक्री के लिए औषधि केंद्र खोलने का सख्त निर्देश दिया गया था. दो साल में भी इस तरह के केंद्र नहीं खोले जाने पर एनआरएचएम की तत्कालीन अभियान निदेशक आराधना पटनायक ने इसके लिए एक माह का समय सभी सिविल सर्जनों को दिया था. 9 जुलाई को यह समय सीमा खत्म हो गई. लेकिन एक भी जिले में केंद्र नहीं खुल सका. सिविल सर्जनों द्वारा स्थल चिह्नित करने तथा लाइसेंस लेने की प्रक्रिया शुरू कर एक तरह से खानापूर्ति की गई.
एक चौंकाने वाली खबर छत्तीसगढ़ से है. बिलासपुर से आई ख़बर में बताया गया है कि जेनेरिक दवाइयों के ज़रिए महंगे इलाज को सस्ता बनाने का सरकारी दावा खोखला है. राज्य में जेनेरिक दवा के नाम पर जेनेरिक-ब्रांडेड दवाओं की बिक्री की जा रही है. इनके एवज में दोगुने से अधिक कीमत ली जा रही है. इतना ही नहीं, सरकारी अस्पताल के मरीजों को झांसा देने के लिए रेडक्रास मेडिकल शॉप द्वारा इन दवाओं पर 40 फीसदी तक की छूट दी जा रही है. इस बावत दैनिक भास्कर अपने पड़ताल में इस नतीजे पर पहुंचा है कि बिलासपुर के रेडक्रास मेडिकल शॉप में जेनेरिक दवा के नाम पर मरीजो को लूटा जा रहा है. यानी यहाँ भी एम.एम.आर.पी का भूत लोगों को परेशान किए हुए है.
ऐसे में सबसे अहम सवाल ये उठता है कि इस मसले पर सभी राज्य एक जुट होकर जनहित में कोई कारगर क़दम उठा सकते हैं. दवाओं की एम.एम.आर.पी को आखिर कब नियंत्रित किया जायेगा..? क्या हमारी सरकारें कंपनियों की कठपुतली ही बनी रहेंगी..? सवाल अनंत है. जवाब एक ही है जबतक कंट्रोल एम.एम.आर.पीपर सरकारें गंभीर नहीं होगी देश की जनता हेल्थ के नाम पर इसी तरह लूटी जाती रहेगी.

(लेखक प्रतिभा जननी सेवा संस्थान के नेशनल को-आर्डिनेटर व युवा पत्रकार हैं.)

असली दवाइयों की काली छाया!!!


कंट्रोल एम.एम.आर.पी अभियान के तहत...



आशुतोष कुमार सिंह


भगवान के बाद किसी पर आम लोगों का सबसे ज्यादा भरोसा है तो वे हैं दवा, डॉक्टर और दुकानदार। दवा, डॉक्टर और दुकानदार के इस त्रयी के प्रति हमारी भोली-भाली जनता इतनी अंधभक्त है कि डॉक्टर साहब जितनी फीस मांगते हैं, दुकानदार महोदय जितने का बिल बनाते हैं, उसको बिना लाग-लपेट के अपनी घर-गृहस्थी को गिरवी रखकर भी चुकता करती है।
इसी परिप्रेक्ष्य में एक छोटी-सी घटना से अपनी बात कहना चाहूंगा। पिछले दिनों मालाड, मुम्बई स्थित एक अस्पताल में मेरे मित्र की पत्नी अपना ईलाज कराने गई। डॉक्टर ने उन्हें स्लाइन (पानी बोतल) चढ़ाने की बात कही। अस्पताल परिसर में स्थित दवा दुकानदार के पास डाक्टर द्वारा लिखी गई दवाइयों को खरीदने मैं खुद गया। डॉक्टर ने जो मुख्य दवाइयां लिखी थी उसमें मुख्य निम्न हैं-
डेक्सट्रोज 5%
आर.एल
आई.वी.सेट
निडिल
डिस्पोजल सीरिंज
और कुछ टैबलेट्स।
डेक्सट्रोज 5% का एम.आर.पी-24 रूपये, आर.एल का-76 रूपये, आई.वी.सेट का-117 रूपये, निडिल का-90 रूपये और डिस्पोजल सीरिंज का 8 रूपये था।
मेरे लाख समझाने के बावजूद दवा दुकानदार एम.आर.पी. (मैक्सिमम् रिटेल प्राइस) से कम मूल्य पर दवा देने को राजी नहीं हुआ। वह कहते रहा कि मुम्बई दवा दुकानदार एसोसिएशन ने ऐसा नियम बनाया है जिसके तहत वह एम.आर.पी. से कम पर दवा नहीं दे सकता। मजबूरी में मुझे वे दवाइयां एम.आर.पी. पर खरीदनी ही पड़ी।
    गौरतलब है कि डेक्सट्रोज 5% का होलसेल प्राइस 8-12 रूपये, आर.एल का 10-17 रुपये, निडिल का 4-8 रुपये, डिस्पोजल सिरिंज का-1.80-2.10 रूपये तक है। वहीं आई.वी.सेट का होलसेल प्राइस 4-10 रूपये है।
ऐसे में सबकुछ जानते हुए मुझे 117 (आई.वी.सेट)+90(निडिल)+76(आर.एल)+24(डेक्सट्रोज)+8(डिस्पोजल सिरिंज) का देना पड़ा। यानी कुल-117+90+76+24+8=315 रुपये देने ही पड़े।
ध्यान देने वाली बात यह है कि इन दवाइयों का औसत होलसेल प्राइस-10+14+6+2+8=40 रुपये बैठता है। यानी मुझे 40 रूपये की कुल दवाइयों के लिए 315 रूपये वह भी बिना किसी मोल-भाव के देने पड़े। इस मुनाफे को अगर प्रतिशत में काउंट किया जाए तो 900 फीसद से भी ज्यादा का बैठता है।
ऐसे में यह वाजिब-सा सवाल है कि इस देश की गरीब जनता असली दवाइयों की इस काली छाया से कब मुक्त होगी। एम.आर.पी. के भूत का कोई तो ईलाज होना चाहिए।  
(लेखक प्रतिभा जननी सेवा संस्थान के नेशनल को-आर्डीनेटर हैं)