मंगलवार, 11 सितंबर 2012

राष्ट्रीय औषध मूल्य नियंत्रण प्राधीकरण ( एन.पी.पी.ए ) के नाम खुला पत्र



आम लोगों को गुमराह न करें एन.पी.पी.ए!!!


पूरा देश जानता है कि दवाइयों के मूल्य किस तरह से दवा कंपनियां मनमाने तरीके से निर्धारित कर रही है। इन मूल्यों को मोनिटर करने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय औषध मूल्य नियंत्रण प्राधीकरण की है। एन.पी.पी.ए के जो कार्य गिनाए गए हैं उनमें सबसे पहले ही यह कहा गया है कि डीपीसीओ के नियमों को लागु करवाना उसकी जिम्मेदारी है। 
आज दिनांक 6.09.2012 को नवभारत टाइम्स, मुम्बई के पृष्ठ संख्या 10 पर छपी एक खबर में एन.पी.पीए चेयरमैन सी.पी.सिहं के हवाले से बताया गया है कि, कुछ लोगों को लगता है कि कुछ कंपनियां लागत से काफी ज्यादा कीमत डिक्लेयर करके भारत में दवाएं लांच कर रही हैं। वे लैंड प्राइस कैसे तय करती हैं इसके बारे में हमें कुछ पता नहीं चलता।
हमें खेद हैं कि एन.पी.पी.ए के चेयरमैन आम लोगों को भरमाने का प्रयास कर रहे हैं। पिछले ढाई महीने से चलाए जा रहे कंट्रोल एम.एम.आर.पी अभियान के तहत ऐसे कई सबूत पेश किए जा चुके हैं जो यह सिद्ध करता हैं कि भारतीय कंपनियां भी डी.पी.सी.ओ. के नियमों का पालन नहीं कर रही हैं और अपने हिसाब से मूल्य तय कर रही हैं। जिससे आम लोगों को भारी आर्थिक नुक्सान हो रहा है।
एन.पी.पी.ए. के चेयरमैन श्री सी.पी.सिंह साहब को क्या अभी तक इस बात की जानकारी नहीं मिल पायी है कि किस तरह से भारतीय कंपनियां भी ज्यादा मूल्य तय करके सरकार व आम जनता को अरबों का चूना लगा रही है। अगर नहीं मालूम है तो शर्म की बात है और अगर मालूम है उसके बाद भी इस तरह का बयान दे रहे हैं तो और भी शर्म की बात है।
अंत में मैं एन.पी.पी.ए से अनुरोध करना चाहता हूं कि वह देश की जनता के हितों को ध्यान में रखकर अपनी ढुलमुल नीति से ऊपर उठे और सरकार द्वारा प्रदत अपनी शक्ति को पहचाने व उसका सही सदुपयोग करें। 

आपका अपना
आशुतोष कुमार सिंह
नेशनल को-आर्डिनेटर, प्रतिभा जननी सेवा संस्थान

प्रत्येक साल 3,6000000 लोगों को गरीब बना रही है बीमार स्वास्थ्य सुविधाएं...

कंट्रोल एम.एम.आर.पी अभियान के तहत...

आशुतोष कुमार सिंह

भारत एक लोक कल्याणकारी राज्य है। जहाँ के सभी नागरिकों को स्वतंत्रता पूर्वक जीने का अधिकार मिला हुआ है। लेकिन धीरे-धीरे ऐसे हालात बनते जा रहे हैं जिसके कारण जनसमूह का प्रतीक भारत राष्ट्र भी बीमार होता जा रहा है। 
आजादी के बाद से अभी तक के आंकड़े बताते हैं कि भारत अपने स्वास्थ्य नीति को लेकर कभी भी गंभीर नहीं रहा है। ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत अपने सकल घरेलु उत्पाद का लगभग 1 प्रतिशत राशि ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता है। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में स्वास्थ्य सेवाओं पर इतना कम खर्च राष्ट्र को स्वस्थ रखने के लिए किसी भी रूप में पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है। 
हाल ही में रिसर्च एजेंसी अर्नेस्ट एंड यंग व भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) की ओर से जारी एक रिपोर्ट पर ध्यान दिया जा सकता है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत सरकार को यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (यूचसी) प्रोग्राम यानि सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल लक्ष्य के क्रियान्वयन के लिए अपनी सकल घरेलु उत्पाद यानी जीडीपी का लगभग 4 फीसदी हिस्सा बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करना होगा। इस रिपोर्ट में स्वास्थय से संबंधित जो मुख्य बातें बतायी गयी है उसके मुताबिक लगभग 80 फीसदी शहरी परिवार और 90 फीसदी ग्रामीण परिवार वित्तीय परेशानियों के कारण अपने वार्षिक घरेलू खर्च का आधा हिस्सा भी ठीक से स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च नहीं कर पाते। सन् 2008 किए गए अध्ययन के आधार पर जारी इस रिपोर्ट में जो सबसे चौकाने वाला तथ्य यह है कि स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित खर्च के कारण भारत की आबादी का लगभग 3 फीसदी हिस्सा हर साल गरीबी रेखा के नीचे फिसल जाता है। यानी एक ओर जहाँ सरकार गरीबी खत्म करने की बात कर रही है वही स्वास्थ्य सेवाओं पर ध्यान नहीं देने के कारण देश में गरीबी लगातार बढ़ रही है। यहाँ पर यह भी ध्यान देने वाली बात है कि स्वास्थ्य सेवाओं पर कुल खर्च का 72 प्रतिशत केवल दवाइयों पर खर्च होता है। यह बात हम भी कई सालों से कहते आ रहे हैं लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं था। इसी कड़ी में नयी मीडिया के माध्यम से ‘कंट्रोल एम.एम.आर.पी.’ कैंपेन पिछले 22 जून 2012 से चलाया जा रहा है। जिसके तहत दवाओं पर गलाकाट मैक्सिम रिटेल प्राइस को कंट्रोल करने की वकालत इस कैंपेन को चलाने वाली संस्था प्रतिभा जननी सेवा संस्थान कर रही है।
रिसर्च एजेंसी अर्नेस्ट एंड यंग व फिक्की के संयुक्त तत्वाधान में जारी इस रिपोर्ट में सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल लक्ष्य के बेहतर क्रियान्वयन के लिए एक रूपरेखा बनाने की आवश्यकता पर सरकार का ध्यान आकृष्ट किया गया है। जिसके तहत सरकार अपने सभी नागरिकों को सस्ती कीमत पर दवाईयां और स्वास्थ्य सुविधाएं अनिवार्य रूप से उपलब्ध करवायेगी। रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया गया है कि अगर जीडीपी का 4 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च किया जाए, तो अगले 10 सालों में सबके लिए सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल लक्ष्य को हासिल किया जा सकेगा।
इस संदर्भ में विश्व स्वास्थ्य सभा ने 2005 में अपने सभी सदस्य देशों से आग्रह किया था कि अपने आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संदर्भ के आधार पर सभी देश इस तरह के कार्यक्रम की दिशा में काम करें। बावजूद इसके भारत इस दिशा में कोई बेहतर योजना को क्रियान्वित करने में सफल नहीं हो पाया है।
यदि हमारी सरकार अपने से ज्यादा जनसंख्या वाले देश चीन की स्वास्थ्य नीति से कुछ सीख ले तो शायद हम भारतीयों का स्वास्थ्य भी तंदरूस्त हो सकता है। गौरतलब है कि चीन एकमात्र ऐसा देश है जो अपनी विशाल जनसंख्या के कारण इसी तरह की स्वास्थ्य समस्याओं का समाना कर रहा है, लेकिन इसके बावजूद भी पिछले दो वर्षों में वह 84 फीसदी जनसंख्या को बेहतर सुविधाएं मुहैया कराने में सफल रहा है और फिलहाल जीडीपी का 5 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च भी कर रहा है।
अब समय आ गया है कि स्वास्थ्य सेवाओं को स्वस्थ करने के लिए सरकार दवा कंपनियों द्वारा अपने मनमर्जी से तय की जा रही एप.आर.पी को कंट्रोल करें। सरकारी केमिस्ट की बहाली करें। जीवन-रक्षक दवाइयों को मुफ्त वितरण की व्यवस्था करें। अगर सरकार अभी नहीं चेती तो आने वाले समय में राष्ट्र का स्वास्थ्य और खराब होने की आशंका है, ऐसे में भारत को विकसित राष्ट्र के रूप में देखने का सपना, सपना ही बन कर रह जायेगा।
(लेखक प्रतिभा जननी सेवा संस्थान के राष्ट्रीय को-आर्डिनेटर व युवा पत्रकार हैं)

“सबको स्वास्थ्य” का नारा कब होगा हमारा!!

कंट्रोल एम.एम.आर.पी अभियान के तहत

 किशोर कुमार 

सरकार ने स्वीटजरलैंड की एक कंपनी को कैंसर की दवा को भारत में पेटेंट करने से मना कर दिया। यह प्रशंसनीय कदम है। लेकिन वह पूरे देश में जब तक जेनरिक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं करेगी, तब तक “सबको स्वास्थ्य” संबंधी भारत सरकार की संकल्पना महज नारा बनकर ही रह जाएगी और मात्र 20 रूपए प्रतिदिन अर्जित करने वाली देश की अस्सी फीसदी जनता दवा के अभाव में काल-कलवित होती रहेगी। यह एक कड़वा सच है कि टीबी से प्रतिवर्ष देश में तीन लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है और ज्यादातर मौतें गरीबों की होती है, जो इस बीमारी का महंगा इलाज नहीं करा पाते हैं। 
सरकारी उदासीनता कहें या सोची-समझी रणनीति का नतीजा, भारत में आम आदमी सस्ती जेनरिक दवाओं की पहुंच से दूर ही रहता है। बावजूद इसके विदेशी दवा कंपनियां अपनी दवाओं के पेंटेट को लेकर बहुत ज्यादा संवेदनशील हैं। दरअसल बहुराष्ट्रीय कंपनियों को यह चिंता हमेशा सताती रहती है कि भारत की जनता ने भविष्य में कभी भी जेनरिक दवाएं उपलब्ध कराने के पक्ष में माहौल बनाया तो उनका मुनाफा कई गुणा कम हो सकता है। 
इसलिए बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों की दवाओं को भारत में पेटेंट करने की अनुमति देने में बड़ी सावधानी बरतने की जरूरत है। साथ ही यह सुनिश्चित कराना भी जरूरी है कि जेनरिक दवाओं और बहुराष्ट्रीय अथवा देश की दवा कंपनियों की दवाओं और समान साल्ट वाले जेनरिक दवाओं की कीमतों में ज्यादा अंतर नहीं रहने पाए। 
यह खुशी की बात है कि स्वीटजरलैंड की कंपनी नोवार्टिस की कैंसर के उपचार के लिए बनाई गई नई दवा “ग्लिवेक” को भारत के पेटेंट विभाग ने देश में पेटेंट करने की अनुमति देने से इन्कार कर दिया है। विभाग का कहना है कि यह नई दवा नहीं बल्कि पहले से बाजार में बिक रही एक दवा का नया संस्करण भर है।
अब भारत सरकार यदि जेनरिक दवाओं को आम जन तक पहुंचाने ईमानदार पहल कर दे तो देश की जनता का बड़ा भला होगा। भारत सरकार के रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के औषधि निर्माण विभाग ने नवंबर 2008 में सस्ती जेनरिक दवाओं की बिक्री के लिए दो वर्षों के भीतर 250 जन औषधालय खोलने का फैसला किया था। लेकिन सरकार की इस घोषणा से “नौ दिन चले ढ़ाई कोस” वाली कहावत चरितार्थ हुई। 
उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सवा तीन साल में यानी इस साल फरवरी तक मात्र 117 जन औषधालय ही खोले जा सके हैं। लेकिन प्रचार-प्रसार की कमी के कारण इतने औषधालय भी अभी जनता से दूर ही हैं। यह समय का तकाजा है कि सरकार या तो खुद या फ्रेंचाइजी देकर बड़ी संख्या में जन औषधायल खोले और उसका व्यापक प्रचार-प्रसार हो। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि चिकित्सक दवाओं के ब्रांड नेम की जगह साल्ट के नाम लिखें। 
जन औषधालय भारत जैसे गरीब देश के लिए कितना जरूरी है, इसका अंदाजा कुछ जेनरिक दवाएं और ब्रांडेड दवाओं की कीमतों में अंतर को देखकर भी समझा जा सकता है। मिसाल के तौर पर ब्रांडेड पैरासिटामॉल का दस टैबलेट वाला स्ट्रीप 5 से 9 रुपये में बिकता है तो उसी साल्ट की जेनरिक दवा 2.12 पैसे में उपलब्ध है। इसी तरह ब्रांडेड रॉक्सीथ्रोमाइसिन एंटीबायटिक 120-700 रुपये में बाजार में उपलब्ध है तो इसकी जेनरिक दवा मात्र 18.91 रूपए में। 
अब यह देखना है कि सरकार अपने “सबको स्वास्थ्य” संबंधी नारे को किस तरह फलीभूत करती है। जनता और उसके प्रतिनिधियों को इस मामले में बेहद सतर्क रहने की जरूरत है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

सरकारी केमिस्ट क्यों नहीं हैं?


आशुतोष कुमार सिंह

स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन निवास करता है। यह बात हम बचपन से सुनते आ रहे हैं। सही भी है। जब तक शरीर स्वस्थ नहीं होगा, आप कुछ बेहतर कर नहीं पायेंगे। अगर आप अपनी हुनर का इस्तेमाल अस्वस्थता के कारण नहीं कर पा रहे हैं, तो कहीं न कही इससे राष्ट्र को क्षति पहुंचती है। शायद यही कारण है कि मन को धारण करने वाली इस काया को निरोगी बनाये रखने पर सदियों से हमारे पूर्वज ध्यान देते रहे हैं।
दुर्भाग्य से आज हिन्दुस्तान का स्वास्थ्य खराब होता जा रहा है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। महत्वपूर्ण कारण यह है कि भारत में व्यवस्थित एवं कारगर स्वास्थ्य नीति ही नहीं हैं। बीच-बीच में सरकार नीतियां बनाती-बिगाड़ती रही हैं, लेकिन वे कारगर सिद्ध नहीं हो पायी हैं। ऐसे में यह सोचनीय प्रश्न है कि भारत की जनता को कैसे स्वस्थ रखा जाए।
मानव स्वभावतः स्वस्थ रहना चाहता है। कई बार परिस्थितियां ऐसी बनती है वह अपने शरीर को स्वस्थ नहीं रख पाता। भारत जैसे देश में लोगों को बीमार करने वाली और लंबे समय तक उन्हें बीमार बनाये रखने वाली परिस्थितियों की लम्बी-चौड़ी लिस्ट है। लेकिन इन सभी सूचियों में एक कॉमन कारण है अर्थाभाव। यानि भारत के लोग धनाभाव में अपना ईलाज व्यवस्थित तरीके से नहीं करवा 
पाते हैं। 
देश में मरीजों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। उसी अनुपात में लोगों का हेल्थ बजट भी बढता जा रहा है। दूसरे मद में तो आदमी अपनी बजट में कटौती कर भी सकता है लेकिन हेल्थ ऐसा मसला है जहां पर जीवन-मरण का प्रश्न रहता है, ऐसे में हेल्थ के नाम पर जितना खर्च करना पड़ता है, वह करना ही पड़ता है। इसके लिए चाहे घर बेचना पड़े, देह बेचना पड़े अथवा किसी की गुलामी ही क्यों न करनी पड़े, सबकुछ करने के लिए आदमी तैयार रहता है।
यह बात भारत सरकार भी मानती है कि यहां के लोगों की आर्थिक स्थिति बहुत खराब है। इस बात को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार देश को स्वस्थ रखने के लिए कई तरह की हेल्थ स्कीमे चलाती रहती हैं। बावजूद इसके परिणाम ढाक के तीन पात वाले ही हैं। ऐसी स्थिति में भारत की पूरी हेल्थकेयर नीति ही कटघरे में आती हुई प्रतीत हो रही है।
पिछले दिनों नई मीडिया में और अब तो मेन स्ट्रीम मीडिया में भी भारत की पूरी हेल्थकेयर नीति को लेकर बहस चल पड़ी है। फेसबुक के माध्यम से ‘कंट्रोल एम.एम.आर.पी’ ( कंट्रोल मेडिसिन मैक्सिमम रिटेल प्राइस ) नामक एक नेशनल कैंपेन चलाया जा रहा है। जिसमें देश के विचारवान लोग हेल्थ नीति पर खुल कर चर्चा कर रहे हैं। इन चर्चाओं के परिणाम स्वरूप कुछ चौकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। मसलन दवा कंपनियां अपनी एम.आर.पी लागत मूल्य से 1100 प्रतिशत ज्यादा तक लिख रही हैं। इस बात की पुष्टी भारत सरकार का कार्पोरेट मंत्रालय भी कर चुका है। दवा कंपनियां ब्रांड के नाम पर मरीजों को लूट रही हैं। जैसे एक साल्ट से निर्मित दवा को कोई कंपनी 50 में बेच रही है तो कोई 100 में। दवाइयों की क्वालिटी संदिग्ध हैं। दूसरे देशों में बैन हो चुकी दवाइयां भारत में धड़ल्ले से बेची जा रही हैं। डाक्टर अनावश्यक जांच लिखते हैं। डॉक्टर घुस खाकर दवाइयां लिखते हैं। दवा दुकानदार जेनरिक के नाम पर लोगों को लूट रहे हैं। सरकारी अस्पतालों में दवाइयां उपलब्ध नहीं होती। इस तरह के सैकड़ों तथ्य सामने आ रहे हैं। इन तथ्यों को और गहराई से जानने की जरूरत है।
सबसे परेशान करने वाला तथ्य यह है कि सरकार ने इन सभी समस्याओं को दूर करने के लिए राष्ट्रीय औषध मूल्य नियंत्रण प्राधीकरण नामक एक स्वतंत्र नियामक बना रखा है। जिसकी जिम्मेदारी है कि वह देश में बेची जा रही दवाइयों के मूल्यों को नियंत्रित करे। इसके लिए बहुत सुन्दर कानून भी है। दवा कंपनियों द्वारा मनमाने तरीके से दवाइयों के रेट तय करना इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि यह प्राधीकरण अपने कार्यों को करने में पूरी तरह असफल हो चुका है।
इन सभी चर्चाओं को समझने के बाद एक और महत्वपूर्ण सवाल कौंध रहा है, देश में सरकारी डॉक्टर हैं, सरकारी अस्पताल हैं...तो उसी अनुपात में सरकारी केमिस्ट क्यों नहीं हैं?
( लेखक कंट्रोल एम.एम.आर.पी कैंपेन चला रही संस्था प्रतिभा जननी सेवा संस्थान के नेशनल को-आर्डिनेटर व युवा पत्रकार हैं )

दवा कंपनियों का खुल्लम खुल्ला डाका

कंट्रोल एम.एम.आर.पी अभियान के तहत

आशुतोष कुमार सिंह

देश में फैले दवाइयों के मकड़जाल को जितना समझने का प्रयास कर रहा हूं, उतना ही उलझते जा रहा हूं.इसकी गहराइयों में जितना डूब रहा हूं, कुछ देर बाद मालुम चल रहा है कि अभी तो मैं ऊपर ही ऊपर तैर रहा हूं. खैर, जब ओखल में सिर डाल ही दिया हूं तो मूसल से क्यों डरू.
 
जरा गौर से सिपला कंपनी की इस रेट लिस्ट को पढिए. तीन दवाइयों को हाइलाइट किया गया है.उस पर जरा और गौर फरमाइए. एमसिप 500 मिली. के एक इंजेक्शन का एम.आर.पी 72 रूपये बताया गया है और इसी का स्टॉकिस्ट प्राइस 7.42 रुपये है। सेटसिप टैबलेट प्रति 10 टैबलेट का एम.आर.पी 33.65 है जबकि स्टॉकिस्ट प्राइस 1.88 रूपये है.इसी तरह सेफटाज इंजेक्शन का मूल्य देखिए एम.आर.पी 355 रूपये और स्टॉकिस्ट प्राइस 66 रूपये है. सरकारी नियम यह कहता है कि कंपनियां लागत मूल्य से अधिकतम 100 प्रतिशत तक एम.आर.पी रख सकती हैं.इस नियम का पालन कितना हो रहा है.आप खुद देख सकते हैं. 
पिछले डेढ़ महीने से चल रहे ‘कंट्रोल एम.एम.आर.पी’ अभियान का कुछ सकारात्मक असर दिखने तो शुरू हुए हैं लेकिन यह ऊंट के मुंह में जीरा का फोरन भी नहीं है। सरकार जल्द ही नेशनल फार्मास्यूटिकल्स पॉलिसी 2011 लाने वाली है. इसमें भी गरीबों के हितों की रक्षा होता नज़र नहीं आ रहा है.

मुनाफाखोर दवा कंपनियां सावधान!


मीडिया जाग रही है, देश भी जागेगा...


आशुतोष कुमार सिंह
दवाइयों में मची लूट के बारे में पिछले एक महीने से लगातार लिखने-पढ़ने, सुनने-सुनाने के बाद अब देश की मुख्यधारा की मीडिया इस मसले को उठाने में जुट गयी है। एक महीने पहले ‘कंट्रोल एम.एम.आर.पी.’ यानी कंट्रोल मेडिसिन मैक्सीमम रिटेल प्राइस अभियान को जब हमलोगों ने शुरू किया था तब ऐसा लगा था कि पता नहीं कब तक इस जटिल मसले को समझाने में हम सफल हो पायेंगे। लेकिन मीडिया मित्रों से मिले सहयोग ने इस मसले को बहुत जल्द ही राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में मदद की है। रायपुर से प्रकाशित सांध्य दैनिक जनदखल ने सर्वप्रथम इस मसले पर अपनी जोरदार दख़ल दिया। उसके बाद तो प्रत्येक दिन देश के किसी न किसी कोने से इस तरह की खबरे आने लगी। इस पूरे मुहिम में नई मीडिया ने बहुत जबरदस्त भूमिका अदा की है। ‘बियोंड हेडलाइंस’ ने इस मुहिम से जुड़े सभी तथ्यों को जनता के सामने लाने में अहम योगदान दिया है। साथ ही साथ प्रवक्ता डॉट कॉम, जनोक्ति डॉट कॉम, इनसाइड स्टोरी डॉट.कॉम एवं लखनऊ जनसत्ता डॉट कॉम ने इस मसले को प्रमुखता से उठाया है।
‘फेसबुक’ के माध्यम से 22 जून 2012 विधिवत रूप से शुरू हुआ यह नेशनल कैंपेन आज देश की मीडिया के लिए राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है। आज यानी ठीक एक महीने दो दिन बाद इस मसले को दैनिक हिन्दुस्तान ने अपने सभी संस्करणों में प्रमुखता से प्रकाशित किया है। दिल्ली संस्करण में तो यह खबर लिड स्टोरी बनी है। इसी तरह आज 24.07.2012 को रांची से प्रकाशित आई नेक्स्ट ने ‘एम.आर.पी का खेल’ शीर्षक से इस मसले को अपने पहले पृष्ठ पर स्थान दिया है और विस्तृत खबर पृष्ठ 6 पर प्रकाशित किया है ।
अभी ताजा अपडेट यह है कि इस मसले पर जी न्यूज पर खबर चलाई जा रही है। इस पूरी मुहिम में न्यूज एजेंसी वार्ता का बहुत अहम सहयोग मिला है। वार्ता ने अपने यहां से सबसे पहले इस मुहिम के बारे में खबर जारी किया था।
मैं उन सभी मीडिया मित्रों के सहयोग का आभारी हूं, जो फेसबुक पर इस मुहिम को आगे बढाने में हमें प्रोत्साहित कर रहे हैं।
दवा कंपनियों की मुनाफेबाजी व सरकारी हेल्थ केयर नीति की पोल जिस तरीके से एक के बाद एक खुलती जा रही है, निश्चित है कि अब तो सरकार व कंपनियां दोनों जनहित में अपने रवैये को बदलने के लिए मजबूर होंगी।
हमें आशा है कि जिस तरह से इस मसले पर मीडिया जाग रही है, उससे प्रेरित होकर जनता भी जरूर जागेगी।
(लेखक कंट्रोल एम.एम.आर.पी (Control M.M.R.P) अभियान चला रही संस्था प्रतिभा जननी सेवा संस्थान के नेशनल-को-आर्डिनेटर व युवा पत्रकार हैं)
संपर्कःpratibhajanani@gmail.com

देश को लूट रही हैं सबसे बड़ी दवा कंपनी


आशुतोष कुमार सिंह

सिप्रोफ्लाक्सासिन 500 एम.जी और टिनिडाजोल 600 एम.जी साल्ट से निर्मित दवा जिसे सिपला, सिपलॉक्स टी जेड के नाम से बेचती है। लूज मोसन की रामवाण दवा है। सरकार ने जिन 74 दवाइयों को कंट्रोल्ड प्राइस की श्रेणी में रखा है, उसमें एक यह भी है। एन.पी.पी.ए ( नेशनल फार्मास्यूटिकल्स प्राइसिंग ऑथरिटी) द्वारा 23 मार्च 2011 को जारी कंपेडियम ऑफ द प्राइसेस ऑफ शिड्यूल्ड ड्रग्स फिक्स्ड/रिवाइज्ड बाई एन.पी.पी.ए के सातवे एडिशन के पृष्ठ संख्या 70 के क्रम संख्या 166 में इस दवा की सरकारी सेलिंग प्राइस-25.70 पैसा प्रति 10 टैबलेट बतायी गयी है। जिसका विवरण गैजेट संख्या 2500 (ई) है, जिसका नोटिफिकेशन 11.10.2010 को निकाला गया था। शर्म और लानत की बात यह है कि देश की सबसे बड़ी कंपनी का दावा करने वाली सिपला इस दवा को पूरे देश में 100 रूपये से ज्यादा में बेच रही हैं...यानी प्रत्येक 10 टैबलेट वह 75-80 रूपये ज्यादा उपभोक्ताओं से वसूल कर रही है। इस राष्ट्र को स्वस्थ बनाने का दावा करने वाले कहां हैं...है कोई जवाब। आखिर सबके मुंह पर ताला क्यों लग गया है?